जालौन। कैंसर के गंभीर चरण में पहुंच चुके मरीजों के लिए भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित स्वदेशी सीएआर-टी (काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी-सेल) थेरेपी उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है। यह तकनीक विशेष रूप से रक्त कैंसर के उन मरीजों के लिए प्रभावी साबित हो रही है, जिन पर कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी या अन्य पारंपरिक उपचार सफल नहीं हुए हैं।

मरीज की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को बनाया जाता है कैंसर से लड़ने में सक्षम
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के प्रोफेसर एवं वैज्ञानिक डॉ. राहुल पुरवार के अनुसार सीएआर-टी थेरेपी एक उन्नत प्रतिरक्षा चिकित्सा पद्धति है, जिसमें मरीज के शरीर से प्रतिरक्षा कोशिकाएं लेकर उन्हें प्रयोगशाला में आनुवंशिक रूप से संशोधित किया जाता है। इसके बाद इन कोशिकाओं को वापस मरीज के शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है, जहां वे कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर उन्हें नष्ट करती हैं।
रक्त कैंसर के मरीजों के लिए साबित हो रही वरदान
वर्तमान में इस तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से बी-सेल तीव्र लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया और बी-सेल नॉन हॉजकिन लिम्फोमा जैसे रक्त कैंसरों के उपचार में किया जा रहा है। यह विशेष रूप से उन मरीजों के लिए कारगर है, जिनकी बीमारी उपचार के बाद दोबारा लौट आई हो या जिन पर अन्य उपचार पद्धतियां प्रभावी न रही हों।
उत्तर प्रदेश में फिलहाल संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान और मेदांता सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में इस उपचार की सुविधा उपलब्ध है।
जालौन के रामपुरा से निकलकर वैश्विक मंच तक पहुंचे डॉ. राहुल पुरवार
जालौन जनपद के विकासखंड रामपुरा निवासी डॉ. राहुल पुरवार ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा समर सिंह इंटर कॉलेज, रामपुरा से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने जर्मनी से विद्यावाचस्पति (पीएचडी) और अमेरिका के हार्वर्ड चिकित्सा महाविद्यालय, बोस्टन से शोध उपाधि प्राप्त की।
विदेशों में बेहतर अवसर होने के बावजूद उन्होंने भारत लौटकर वैज्ञानिक अनुसंधान को नई दिशा देने का संकल्प लिया और देश में अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीक विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
करोड़ों के इलाज को लाखों में उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ी सफलता
डॉ. राहुल पुरवार के नेतृत्व में विकसित इस स्वदेशी तकनीक को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू राष्ट्र को समर्पित किया जा चुका है । इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम लागत है। विदेशों में जहां इसी प्रकार के उपचार पर चार से पांच करोड़ रुपये तक खर्च आता है, वहीं भारत में विकसित तकनीक के माध्यम से यह उपचार लगभग 26 से 40 लाख रुपये में संभव हो सका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे हजारों कैंसर मरीजों को उपचार का बेहतर विकल्प मिल सकेगा।
नैदानिक परीक्षणों में मिले उत्साहजनक परिणाम
डॉ. पुरवार ने बताया कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग और बायोरैक के सहयोग से वर्ष 2021 में इस तकनीक के विकास की शुरुआत हुई। इसके बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई और टाटा मेमोरियल अस्पताल में 60 मरीजों पर सफल नैदानिक परीक्षण किए गए, जिनमें छह बच्चे भी शामिल थे।
परीक्षणों में बी-सेल ल्यूकेमिया के मरीजों में स्वस्थ होने की औसत दर लगभग 72 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि बी-सेल लिम्फोमा के मरीजों में यह आंकड़ा 68 से 72 प्रतिशत के बीच रहा। लगभग 50 प्रतिशत मरीजों में कैंसर पूरी तरह समाप्त हो गया और कई मरीज तीन वर्ष से अधिक समय तक रोगमुक्त रहे।
अभी रक्त कैंसर तक सीमित, अन्य कैंसरों पर शोध जारी
वैज्ञानिकों के अनुसार फिलहाल सीएआर-टी थेरेपी का नियमित उपयोग रक्त कैंसरों के उपचार तक सीमित है। हालांकि फेफड़े, स्तन, प्रोस्टेट, यकृत और अन्य ठोस ट्यूमर के उपचार के लिए भी इस तकनीक पर शोध जारी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि लगभग 30 प्रतिशत मरीजों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते और कुछ मामलों में बीमारी दोबारा लौट सकती है। इसलिए इस उपचार को विशेषज्ञ रक्त कैंसर चिकित्सकों की निगरानी में ही दिया जाता है।
प्रधानमंत्री के साथ फ्रांस दौरे पर गए डॉ. पुरवार
डॉ. पुरवार को देश के चुनिंदा 120 नवाचारियों में शामिल किया गया है, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फ्रांस दौरे पर जाने का अवसर मिला है। यह दौरा भारत और फ्रांस के बीच वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार तथा तकनीकी सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया ।
उनकी यह उपलब्धि न केवल जालौन बल्कि पूरे बुंदेलखंड और देश के लिए गर्व का विषय बन गई है।
इन वैज्ञानिकों ने भी निभाई अहम भूमिका
सीएआर-टी थेरेपी के विकास में डॉ. पुरवार के अलावा डॉ. अल्का द्विवेदी, डॉ. अथर्व करुलकर, डॉ. हसमुख जैन और डॉ. गौरव नारुला सहित कई भारतीय वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीय वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि देश को कैंसर उपचार के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
अनिल ,वैभव सिंह
बुंदेलखंड कनेक्शन
