झांसी। शहर की ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक धरोहर माने जाने वाले नारायण बाग का अस्तित्व इन दिनों संकट में नजर आ रहा है। लगभग 23 करोड़ रुपये की लागत से हुए सौंदर्यीकरण के कार्यों के बाद बाग की प्राकृतिक पहचान और पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंचने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार नारायण बाग में औषधीय पौधों की नर्सरी भी विकसित थी, जिसमें सर्पगंधा, मुलैठी और शंखपुष्पी जैसी महत्वपूर्ण प्रजातियां संरक्षित थीं।मोर, खरगोश, अजगर सहित कई वन्य जीव दिखाई देते थे। मॉर्निंग वॉक, योग और व्यायाम के लिए भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते थे।

हालांकि अब हालात बदल चुके हैं। आरोप है कि सौंदर्यीकरण के नाम पर हजारों पेड़ और ऐतिहासिक केवड़ा बाग को नष्ट कर दिया गया। प्राकृतिक मिट्टी वाले क्षेत्र की जगह करीब दो किलोमीटर लंबा पक्का पाथवे बना दिया गया, जिससे बाग की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हुई है।
पर्यावरण कार्यकर्ता नरेंद्र कुशवाहा ने नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और मीडिया से नारायण बाग पहुंचकर वर्तमान स्थिति का निरीक्षण करने की अपील की है। उनका कहना है कि कुछ वर्ष पूर्व तक यह स्थल घनी हरियाली, प्राकृतिक सुगंध और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध था। यहां लगभग 200 वर्ष पुराना केवड़ा बाग मौजूद था, जिसकी खुशबू पूरे क्षेत्र में फैलती थी।
अब तो शहर के गंदे नालों का पानी बाग क्षेत्र में छोड़े जाने से दलदल और दुर्गंध की समस्या पैदा हो गई है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि इससे हरियाली तेजी से नष्ट हो रही है और जैव विविधता पर भी खतरा मंडरा रहा है।
नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि नारायण बाग की पर्यावरणीय स्थिति की निष्पक्ष जांच कराई जाए, हरियाली पुनर्स्थापन की योजना बनाई जाए और प्रदूषित जल निकासी पर तत्काल रोक लगाई जाए।
