झांसी। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. आशुतोष सिंह ने किसानों को ककोड़ा की व्यावसायिक खेती अपनाने की सलाह देते हुए कहा है कि वैज्ञानिक विधि से ककोड़ा की खेती अपनाकर कम समय में अधिक आय अर्जित की जा सकती है।

उन्होंने बताया कि यदि किसान नर एवं मादा पौधों का सही अनुपात बनाए रखें तो कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। ककोड़ा की खेती विशेष रूप से गर्मी के मौसम में अधिक लाभकारी सिद्ध होती है तथा इसकी बुवाई जून माह के दूसरे सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक उपयुक्त रहती है।
वर्षा ऋतु में जुलाई के अंत तक भी इसकी बुवाई की जा सकती है।डॉ सिंह के अनुसार ककोड़ा का प्रवर्धन बीज, तना एवं कंद तीनों विधियों से किया जाता है, लेकिन अधिक उत्पादन के लिए नर-मादा पौधों का संतुलन अत्यंत आवश्यक है।
चूंकि ककोड़ा में नर एवं मादा पौधे अलग-अलग होते हैं तथा फल केवल मादा पौधों में लगते हैं, इसलिए खेत में अधिक मादा पौधे होने पर उपज में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
डॉ. सिंह ने बताया कि बीज द्वारा बुवाई जून-जुलाई में की जाती है। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 8 से 10 किलो बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पूर्व बीजों को बाविस्टीन या कार्बेन्डाजिम जैसे फफूंदनाशकों से उपचारित करना चाहिए। तैयार मेड़ों पर 2 सेमी गहराई में 2-3 बीज बोए जाते हैं तथा पौधों के बीच 1 से 2 मीटर की दूरी रखी जाती है। अंकुरण के बाद प्रत्येक स्थान पर केवल एक स्वस्थ पौधा रखना चाहिए।
उन्होंने बताया कि खेत में 8 मादा पौधों पर 1 नर पौधा रखना अधिक लाभकारी माना गया है। तना द्वारा प्रवर्धन बड़े स्तर पर खेती के लिए अधिक उपयुक्त विधि है। चयनित लताओं के दो गाँठ वाले हिस्से को काटकर आई.बी.ए. 1500 पीपीएम घोल से उपचारित कर पॉलीबैग या ट्रे में लगाया जाता है। लगभग 12 से 15 दिनों में जड़ें विकसित हो जाती हैं तथा 25 दिन बाद पौधों को खेत में 8:1 (मादा:नर) अनुपात में लगाया जा सकता है।
