आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रॉय

भारतीय रसायन विज्ञान के क्षेत्र में ध्रुव तारे के समान रोशन हैं आज भी आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रॉय

नयी दिल्ली 02 अगस्त। आज दो अगस्त का दिन हर भारतीय और विशेष रूप से रसायन विज्ञान के क्षेत्र में रूचि रखने वाले लोगों को लिए विशेष महत्व का है। आज ही के दिन 1861 में एक बच्चे का जन्म हुआ था जो आगे चलकर “ भारतीय रसायन विज्ञान के जनक” के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

जीं हां हम बात कर रहे हैं  ” आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रॉय ”  की, जिनका जन्म गुलाम भारत में हुआ था लेकिन उनकी स्वतंत्र चेतना ने लगातार साधना से उन ऊंचाईयों को हासिल किया कि परतंत्रता के काल में भी उनकी ख्याति और योग्यता की धूम दुनियाभर में मची और दुनिया भर के वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों ने उनकी जबरदस्त प्रतिभा का न केवल लोहा माना बल्कि उन्हें विभिन्न सम्मानों से भी नवाजा गया।

आचार्य राय एक ऐसे सादगी पसंद और देशभक्त वैज्ञानिक थे जिन्होंने दुनिया भर में ज्ञान हासिल करने के बाद रसायन के क्षेत्र में जबरदस्त कामयाबी हासिल की और इसके बाद भी अपने गुलाम देश में आकर रसायन प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपने देश को स्वावलंबी बनाने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किये।

उनका जन्म दो अगस्त 1861 को बंगाल के जैसोर जिले के ररौली गांव में हुआ था ,जो वर्तमान में बंगलादेश में है। देश के विकास के लिए औद्योगीकरण के प्रबल समर्थक इस विद्वान ने 1901में अपने कमरे में ही “ बंगाल फार्मास्यूटिकल्स वर्क्स ” के नाम से एक प्रयोगशाला तैयार की, जिसमें विदेशी प्रकार की दवाइयां तैयार करने का लक्ष्य रखा गया। आज यह कंपनी एक लिमिटेड के रूप में देश की प्रमुख दवा निर्माता कंपनी है।

आचार्य प्रफुल्ल का “ नाइट्राइट्स का मास्टर ” भी कहा जाता है।इन्होंने मर्क्यूरस नाइट्रेट नामक पदार्थ 1896 में तैयार किया। बाद में इस यौगिक की मदद से 80 अन्य यौगिक भी तैयार किये।इसके बाद दुनिया भर में उनकी ख्याति फैली, 1920 में इंडियन साइंस कांग्रेस के सभापित निर्वाचित हुए।इन्होंने लगभग 150 शोध पत्र लिखे जो दुनिया की जानी मानी विज्ञान पत्रिकाओं में प्रकाशित किये गये।

इसके अलावा प्राचीन भारत में रसायन विज्ञान के महत्व को दर्शाने के लिए इन्होंने “ हिंदू रसायन का इतिहास” नामक पुस्तक लिखी। यह श्री रॉय के द्वारा लिखा गया एक बेहद महत्वपूर्ण ग्रंथ है जिसके कारण इनकी लोकप्रियता में दुनियाभर में चार चांद लगे बल्कि  देश और विश्व के वैज्ञानिकों को प्राचीन भारत के अज्ञात, विशिष्ट रसायन विज्ञान की जानकारी मिली। इस पुस्तक पर समीक्षा स्वयं जाने माने वैज्ञानिक बर्थेलॉट ने लिखी।

रसायन विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान का परचम लहराने वाले इस महान विद्वान का 16 जून 1944 को हृदयगति रूकने से हो गया लेकिन मृत्युशैया पर जाने से पहले इन्होंने रसायन विज्ञान के क्षेत्र में न केवल ध्रुव तारे समान कामयाबी हासिल की बल्कि देश के औद्योगीकरण के लिए भी विशेष योगदान दिया।

टीम बुंदेलखंड कनेक्शन

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