केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय

मौसम की चुनौती को समझकर करें फसल का चुनाव, जोखिम घटाकर बढ़ा सकते हैं मुनाफा

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झांसी। महानगर स्थित रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के शस्य विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. योगोश्वर सिंह ने किसानों को सलाह दी है कि वे मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसलों का चयन करें, इससे उत्पादन जोखिम कम हो और खेती अधिक लाभकारी बन सके। बदलते मौसम और मानसून की अनिश्चितता के बीच किसानों को समय रहते अपनी फसल योजना में बदलाव करने की आवश्यकता है।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष देश के विभिन्न हिस्सों में अल-नीनो के प्रभाव को लेकर चर्चाएं तेज हैं तथा भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। ऐसी स्थिति में वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों को धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों के बजाय श्री अन्न (मिलेट्स), मक्का, उड़द, अरहर,मूंग, तिल एवं मूंगफली जैसी कम पानी में सफल होने वाली फसलों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मौसम की चुनौती को अवसर में बदलने के लिए किसानों को जल संरक्षण और फसल विविधीकरण की रणनीति अपनानी होगी। सही समय पर सही फसल का चयन न केवल नुकसान कम करता है बल्कि बेहतर उत्पादन और आय का भी मार्ग प्रशस्त करता है।

किसान वर्षा जल संग्रहण के उपाय अपनाएं तथा संचित जल का उपयोग जीवन रक्षक सिंचाई के रूप में करें।

मक्का की बुवाई मेंड़ पर करें व कुंड एवं नाली विधि से करने पर वर्षा जल का अधिकतम उपयोग संभव होता है। सीमित संसाधनों की स्थिति में भी फास्फेटिक उर्वरकों एवं जैविक खादों का प्रयोग अवश्य करें, ताकि प्रतिकूल मौसम में फसलों की सहनशीलता बढ़ सके।

धान की नर्सरी में जलभराव नहीं होने देना चाहिए तथा सिंचाई की आवश्यकता होने पर शाम के समय सिंचाई करना अधिक लाभकारी रहता है। जिन खेतों में अभी फसल नहीं है, उनमें मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई कर खरपतवारों के बीज और कीटों को नष्ट किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार यदि क्षेत्र में वर्षा कम होने की संभावना है तो बाजरा, ज्वार और रागी जैसे मोटे अनाज किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में मिलेट्स आधारित खेती किसानों के लिए सुरक्षित विकल्प मानी जा रही है।

कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मूंग, उड़द और अरहर जैसी दलहनी फसलें भी लाभकारी सिद्ध हो सकती हैं। ये फसलें कम पानी में अच्छी पैदावार देने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक होती हैं। इनकी फसल अवधि सामान्यतः 75 से 90 दिन की होती है और बुवाई जुलाई से अगस्त तक की जा सकती है।

कम वर्षा की स्थिति में तिल, मूंगफली और सोयाबीन जैसी तिलहनी फसलें भी किसानों को अच्छा लाभ दे सकती हैं।
कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने किसानों को ब्रॉड बेड एंड फरो (बीबीएफ) तकनीक अपनाने की सलाह दी है। मूंगफली, मूंग, उड़द, अरहर,तिल और मक्का जैसी फसलों में यह तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। इससे जल संरक्षण, बेहतर जल निकास, जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन, खरपतवार प्रबंधन तथा उपज वृद्धि जैसे अनेक लाभ प्राप्त होते हैं।

डॉ. सिंह ने किसानों को सलाह दी कि वे केवल मौसम पूर्वानुमान के आधार पर निर्णय न लें, बल्कि मिट्टी की प्रकृति, सिंचाई संसाधनों की उपलब्धता तथा बाजार की मांग को भी ध्यान में रखें। यदि वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है तो पूरी खेती को एक ही फसल पर निर्भर न रखें। खेत के अलग-अलग हिस्सों में मोटे अनाज, दलहन एवं तिलहन फसलों का संतुलित मिश्रण अपनाकर मौसम संबंधी जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

वैभव सिंह
बुंदेलखंड कनेक्शन

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